हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, तेहरान स्थित हरम हज़रत अब्दुलअज़ीम हसनी के मुतवल्ली हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन काज़ी अस्कर ने कहा है कि एकता सप्ताह शिया और सुन्नी मुसलमानों के बीच एकता और भाईचारे को मजबूत करने का महत्वपूर्ण अवसर है। दुश्मन शिया और सुन्नी में अंतर नहीं करता, बल्कि मुसलमानों के बीच मतभेद पैदा करके पूरी दुनिया के मुसलमानों को कमजोर करना चाहता है।
उन्होंने हौज़ा न्यूज़ एजेंसी से बातचीत करते हुए कहा कि अहले सुन्नत 12 रबीउल अव्वल, जबकि शिया 17 रबीउल अव्वल को पैगंबर-ए-अकरम (स) के जन्मदिवस के रूप में मानते हैं। इन दोनों तारीखों के बीच के दिनों को ‘सप्ताह-ए-वहदत’ घोषित करने का उद्देश्य शिया-सुन्नी एकता और उम्मत-ए-मुस्लिमा के बीच भाईचारे को बढ़ावा देना था, जिसे इमाम खुमैनी ने भी स्वीकार किया था।
हुज्जतुल इस्लाम काज़ी अस्कर ने कुरआन की आयत “और सब मिलकर अल्लाह की रस्सी को मजबूती से पकड़ो और आपस में मत बंटो” का उल्लेख करते हुए कहा कि इस्लाम मुसलमानों को एकता बनाए रखने और आपसी फूट से दूर रहने की शिक्षा देता है। कुरआन स्पष्ट करता है कि आपसी विवाद मुसलमानों की शक्ति और प्रभाव को कमजोर कर देता है। इसलिए अगर मुसलमान दुनिया में मजबूत बनना चाहते हैं तो उन्हें एकजुट रहना होगा।
उन्होंने स्पष्ट किया कि एकता का मतलब यह नहीं है कि शिया अपने अक़ाइद छोड़कर सुन्नी हो जाएं या अहले सुन्नत शिया हो जाएं, बल्कि इसका अर्थ यह है कि मुसलमान अपने साझा विश्वासों और समान बातों को आधार बनाकर एक-दूसरे के साथ सहयोग करें। सभी मुसलमान एक ईश्वर, एक पैगंबर और एक क़िबला को मानने वाले हैं और उनके बीच अनेक धार्मिक तथा नैतिक मूल्य समान हैं।
हरम हज़रत अब्दुलअज़ीम के मुतवल्ली ने धार्मिक पवित्र स्थानों और मान्यताओं का अपमान करने से बचने पर जोर देते हुए कहा कि कुछ लोग शिया-सुन्नी मतभेदों को बढ़ावा देने के लिए पवित्र मान्यताओं का अपमान करते हैं और ऐसे कार्यों को शिया धर्म से जोड़ते हैं, जबकि इस तरह के व्यवहार का इमाम खुमैनी, रहबर-ए-इंकलाब या मक्तब-ए-अहले-बैत से कोई संबंध नहीं है।
उन्होंने कहा कि कुरआन दूसरे धर्मों के पवित्र प्रतीकों और मान्यताओं का अपमान करने से भी रोकता है, क्योंकि इससे प्रतिक्रिया और अधिक मतभेद पैदा होते हैं। इसलिए मुसलमानों की धार्मिक मान्यताओं और पवित्र स्थलों का अपमान किसी भी स्थिति में उचित नहीं है।
हुज्जतुल इस्लाम काज़ी अस्कर ने दाइश जैसे तकफ़ीरी संगठनों का उल्लेख करते हुए कहा कि दुश्मन शिया और सुन्नी में अंतर नहीं करता। ऐसे संगठनों ने शियाओं के साथ-साथ अहले सुन्नत के उलेमा को भी निशाना बनाया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सप्ताह-ए-वहदत आपसी पहचान, साझा बातों पर ध्यान देने और फूट पैदा करने वाली साजिशों का मुकाबला करने का माध्यम बनना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मुसलमान जितना अधिक अपनी साझा बातों पर ध्यान देंगे और एक-दूसरे का अपमान करने तथा मतभेद पैदा करने से दूर रहेंगे, उतना ही इस्लामी दुनिया मजबूत होगी और दुश्मनों के लिए मुसलमानों को कमजोर करना मुश्किल हो जाएगा।
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